विश्व कोष भाग 10 | Vishav Kosh Bhag 10

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
67.28 MB
कुल पष्ठ :
768
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)शिकोणा--विगुख
स्तगाम पूव लिखित यदि कोणका परिमाय ष्हो,
तो साइन भादिका! परिमाण जो दोगा, वही ९५२०५०७,८-
स्तेग्भमं लिखा गया है ।
कोणका परिमाण यदि से ८.० ८- 'से १८०, हृप०
से २७० और २७० से ३६०' हो, तो उनके पहले कोन
चिक़ लगेगा, वह २:४,६:८ 'स्तम्भमें लिखा गया है 1
प्रत्येक लिकोणमें & अंश; २ बाइ और २ कोण डोति
है, इनमेंसे यदि १ बाइ और दूसरे २ अथ मालूम हों,
तो तोसरे अंग का परिमाण निण य डि या जा सकता है |
केवल एक जगइ इसका कुक्त वेलचर्य हो जाता है।
यदि किसों ब्िभुजक कोणोंको क ख ग कहे और उत्त
कोोंकी विपरोत बाइके नास क ख आर ग हो, तो
साइन क साइन ख साइन ग
किए, बल कलवनटण टस्ट
ग
दर नमः | डर न कद ्
व कोसाइन क * इख ग;
श थ है र्नीः्क्य दर ने रख हि थे
कोसाइन ख इज का
कद नख,* नगद
कोसाइन रू “इक; खा;
इसके सिवा क+ग गस्ू १८० पा और भअन्यान्य
लिकोणमितिके विशेष विशेष सियम विशेष विशेष
थानोंमिं व्यवछत छोते हैं । उक्त नियमों चोर रेखागणित,-
को कईफएक प्रतिज्ञा प्रॉको सहायतास त्रिकोणका लिए य
विषय निकाला जाता है
बतुल च्रिकोगमिति ग्रहनचत्रादिके श्रवस्थान
पोर पथनिण य करनेके लिये व्यवछ्वत होतो है । यदि
कोई समतल कोण वत्तू, लका कैन्द्र मेट कर इसे दो
खुरषोंमें विभ्त करे, ती प्रत्येक चत्त 'लच्छेद मडाइत्त
कहलाता है। इस तरद २ सददाइत्त दारा सोमावद श्रसत
मतल चेत्रकों वत्त ल त्रिकोण ( 8]061108) घिधधा ९ हे
कुदते हैं । सरल लिकोणसितिमें जो सब नियम चवद्डत
होते हैं, वत्तू, ल लिकोयमितिमें भो वही सद नियम,
लायू है ।
विकोणा ( सं ० स्त्रो* ) १ बोनि, भग ! २ श्ूड़ाटिकबच,
'सिचघाइ को लता । -
५
त्रिचार (स'० कली ) लियागां कराया संमाहारः नचारत्रय
समूह, जवाखार, सजो भर सुद्दागा इन तोनों उारोंका
समूह |... ः
ब्िुर (स'० पु ) चोथि ुराणोव अग्राणि यस्थ । कोकि
लाच्ष हच्च) ताल मखाना
लिख ( स ० क्लो ) विधा ख आकाशो६वकाशः फलेईन्र ।
त्रपूष्, खोरा ।
ल्रिखदु (स ० लो ) लिखगां खटानां समा दर । खरात्य,
तोन चारपाइयॉंका समूद |
त्रिखद्री ( स'० स्तौ० ) लिखट,-डोप, । न्रिखद्ूव देखो 1
लिख ( सन यु० ) सामवेदको शाखाके विशिषाध्यायो |
त्रिगढ़ ( स* पु ) त्रिखो गढ़ नद्यो थत्र बढुन्रोइयथ
नदीमिय इति सूतेण अ्व्ययोभावः 1 तोथध में द
मद्दाभारतह घनुप्ार एक तोथ का नाम |
द्विगण ( सं० पु०् ) त्रयाणां घर्मार्थकामांना गया: व; |
ल्रिवम; घम , भय और कास ।
ज्िगन्धक (स ० क्लो ०) त्रयाणो गन्धकद्रव्या गा समादार: ।
की त्रिजात देखो ।
बिगस्भोर ( स ० घु० ? लिमि। गस्भोर! । व जिसका सत्व
(आचरण 9, सर और नाभि गस्भोर दो ।. लोगोंका
विश्वास है कि ऐसा आदमो सदा सुखी रहता दै।
ल्रिगत्त ( म० पु० ) त्रयो गर्ता थत्र। १ देशविशेष।
इसका घत्त मान नाम जालन्घर है । हत्स'छिताके अनु
सार यह कूम विभागक उत्तरकी और अवस्थित है ।
( हृदतसं० १४५२५ ) जालन्चर दखो ।. २ विगत टेशस्थ
भूमि ' ३ इस डेशके निवासो ।
लिगत्त क (सं० घु०) त्रिगत्ता एव स्ारधेकन् | त्रिगत्त देश 1
ल्िगत्तषष्ठ ( स'० पु० ) तिगत्त: बछो वर्गों यस्य । '्रोथु,
जोविसड भेद ।
ल्रिग्ता ( स० स्त्रो० ) तरयो योनिस्था; गती यस्या। 1 १
कामुको स्त्रो; छिनाल स्त्रो । कामुको स्त्रो एकयोनिका
होने पर भो मे धुनके समय ल्ियोनिकाके तुल्य दो जाती
है, इसोसे इसका नाम द्रिगर्ता पडा है। ९ प्रघुरा ।
तरिगत्ति क ( सं० पु० ) त्िगत्त देश ।
त्रिगुण ( स'० क्लौ०) त्याग सत्तरजस्तससां शुणाना समा-
हार; । सख्यशास्त-प्रसिदद सत्य, रज भौर ,तमोशुणात्मक
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