ज्वालामुखी के फूल | Jwalamukhi Ke Phool
श्रेणी : कहानियाँ / Stories

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Add Infomation About. Dr. Sushil Kumar
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
36 MB
कुल पष्ठ :
180
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
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कक्ष में भोजन कर रहे थे ?”“उस दिन मयूर का मांस बना था, इसलिए राजभवन के
दक्षिण-पूर्व के कोने वाले कक्ष में ही भोजन का आयोजन किया
गया था ।” |“सम्राट जब आँगन में हाथ धोने गए तो किस ओर मुँह
करके खड़े थे 7““दक्षिण की ओर ।” दासी ने सोचकर बताया, “मैं उनके
दाद् ओर खड़ी,होकर पानी डाल रही थी । मेरा मुख पूर्व की
और था।”सहसा उत्तेजित होकर शकटार ने पूछा, “उस समय दक्षिण
में प्रमोदवन का द्वार खुला था, विचक्षणे ?”दासी सोचने लगी । दशकटार अपलक दृष्टि से उसके चेहरे की शोर देख रहे थे,
जैसे इसी उत्तर पर सब कुछ निर्भर था। उनके माथे पर बल
पड़ गए थे ।£ टां ৪और प्रसन्तता के कारण उमड़ते हुए भावावेग को रोकने के
लिए शकटार दासी की हथेली दबाकर धीरे से फुसफुस।ए, “औरवहाँ प्रमोदवन का वह विशाल वट्व॒क्ष भी दिखाई पड़ रहा थान, विचक्षणा [”शकटार ने इस तरह विनती-सी की जैसे दासी की 'हाँ पर
उनके श्रपनेप्राणहीनिभरहो।दासी ने सिर हिलाकर हाँ कहा ही था कि आये शकटार
हँस पड़े; बोले, “तू अभय हो, विचक्षणा ! देख, पूर्व में भोर कीहि
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