राग विराग | Raag Viraag

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उनके स्वर में घोर हृठाशा थी। ऊँसे ८-१० साल भी तपस्या पर दिश्ती ने पानी फेर दिया हो । ठनदम सास पट्लेयाली वह बाठ याद हो आयी । बादू जो रिटायर हो गये थे और हम सब अपना सामान समेटकर भया के पास वा गये थे। शहर के स्कूल का एक होवा-सा मने में था। पर बहुत जल्दी ही मैंने अपना सिगका जमा लिया । सड़कियां मेरें कपड़ो का मजाक बताती, मेरी भाषा की नकल उतारती पर एक तुश्प चाल मेरे पास भी पी-मेरी आवाज | महीने-दो महीने में ही मैंने कई फैन जुटा लिये ये । स्कूल के वापिकोरसव में पहली बार मंच पर जाने का अवसर मित्ता । सुम्रम संगीत की प्रतियोगिता थी । मुझे ठो मया कोई गीत याद भी नहीं दा । यही पुराना-सा--'पूघद के पट झ्ोता ही गा दिया और बाजो मार मी । प्रथम पुरस्कार के लिए जब मेरे नाम की घोषणा हुई ठो कितमनों के घेहरे देखने ज्ञायक हो गये ये । निर्यायर्कों में एक युजुर्म-से ब्यगिति भी थे। कार्यक्रम की समाप्ठि पर उन्होंने पास बुलाकर शावाशी दी, नाम पूछा, फिर बोले, “गाना सीयोगी ?” भराना 2” “हां;--अगर सीखना घाहों तो अपने पिहा डी से कहता, मुझ मिल सें। उनका बताया पता रटते हुए ही मैं घर पहुंची । रात-भर खुशी के मारे नींद नहीं आयी | दूसरे दिन सुबह-सवेरे मैं दावू जी को घस्तीटकर सेठ रामदास जी की धगीची में से गयी। वहां बीचोदीच शो रघुताय जी का सुन्दर मंदिर था। छोटा-सा, शितु सुन्दर-सा। सर्फद पत्थर पर रंगीन नक्काशी थी। फर्गे पर काले-सफेंद संगमरमरी चौकोर टुकड़े जडे हुए ये । युगल जोडी डी मूर्तियां तो इतनो मुन्दर थीं कि आंख टिकी रह जाती थी । हम सोग पहुंचे, उस समय आरती हो रही थी। याहर इगका-दुश्का दर्शनार्पी खडे थे। भीतर कसवा ते सज्जन रेशमी धोनी पहने आरती उतार




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