संत काव्य - धारा | Sant Kavya - Dhara

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Sant Kavya - Dhara  by आचार्य परशुराम चतुर्वेदी - Acharya Parshuram Chaturvedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ढ संत-काव्यधारा इसी प्रकार जब किसी अलंकार के प्रयोग द्वारा भावविशेष का अभीष्ट रूप हृदयंगम नही हो पाता, अपितु वह केवल चमत्कारवद्धक ही सिद्ध होता है, तो वह एक प्रकार के काव्य-दोष का कारण बन जाता है। काव्य के उत्कर्ष का आधार समझी जाने वाली कतिपय साहित्यज्ञों द्वारा प्रस्तावित 'ध्वनि' एवं 'रीति' नामक शक्तियों की चर्चा भी क्रमश: रस एवं अलंकार का वर्ण न करते समय ही की जा सकती है । क्योंकि ध्वनि एक प्रकार के साहित्यिक स्वाद' की ही सृप्टि करती है और अलंकार को भी इसी प्रकार, वस्तुत: वर्णनशैली के एक ढंग विशेष से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता । हिन्दी काव्यधारा हिन्दी काव्य का इतिहास कम पुराना नहीं है । अपभ्रंश एवं प्राचीन हिन्दी की वेश-भूषा में इसके उदाहरण विक्रम की टठुवीं शताब्दी से ही मिलने लगते हैं जिनमें से कुछ तो प्रबन्धकाब्य हैं और दूसरे फुटकर पदों आदि के रूपों में दीखूते हैं। उस काल से हिन्दी भाषा का क्रमश: निवरना आरम्भ हो जाना है और उसका वास्तविक हिन्दी रूप विक्रम की १३वीं शताब्दी में जाकर प्रकट होता टै । इस समय तक रची गई काव्यों की सबदियों, चारणों के छप्पयों, भक्तों के पदों तथा अज्ञात कब्रियों की प्रेम-कहानियों में हमें इसके अनेक शब्द एवं वाक्य कुछ परिचित से समझ पड़ने लगते हैं । ऐसा लगता है कि अब हम किसी सुविदित क्षेत्र में पदापंण कर रह हैं । इस समय अपने चारों ओर दृष्टिपात करने पर पता चलता है कि हिन्दी काव्य की सरिता एक से अधिक स्रोतों में प्रवाहित हो रही है जिनकें मूल उद्गमों की परम्पराएँ भिन्न-भिन्न हैं। उदाहरणार्थ, यदि एक का लगाव ग्रोग तथा सांप्रदायिक विपयों से है तो दूसरे का श्रद्धा एवं भक्ति के साथ है । इसी प्रकार यदि एक अन्य का सम्पक प्रेमाख्यानों से है तो दूसरे का वीरगाथाओं तथा कोततिंगानों के साथ है । इसी बात को यदि साहित्यिक शब्दावली द्वारा व्यक्त किया जाय तो कह सकते हैं कि प्रथम दो प्रकार की रचनाएं यदि शांतरस-प्रधान हैं तो तीसरे प्रकार की शंगाररस-प्रधान । उसी प्रकार उबत अंतिम दो की गणना हम वोररस-प्रधान काव्यों में कर सकते हैं। कहना न होगा कि उपयंक्त विषय किसी -न- किसी रूप में हमारे हिन्दी काव्य की प्रमुख वण्परं -वस्तु बनकर प्राय: ८०० वष और आगे तक निरंतर चले आते हैं। आधुनिक समय तक पहुँचने पर ही हमें उनमें कोई वास्तविक परिवतंन लक्षित हो पाता है । हिन्दी साहित्य के इतिहासकार उसके काव्य का आरम्भ पहले-पहल अधिकतर वीररस-प्रधान कृतियों से ही किया करत थे और उसका आदिकाल “वीरगाथा-काल' के नाम से प्रसिद्ध हो चला था । किन्तु इधर की खोजों द्वारा प्राप्त किये गए हस्तलिखित ग्रन्थों के आधार पर अब यह नामकरण कुछ अनुपयुक्त-सा जान पड़ने लगा है और नजिन्न-भिन्न लेखक अब इसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारने लगे हैं । तदनुसार आजकल यदि कोई इसे उस समय की प्रचलित भाषा के आधार पर नाम देना चाहते हैं तो दूसरे इसकी उपलब्ध कृतियों की प्रष्ठभ्ूमि-रवरूप सामाजिक दशा को महत्व देते हैं । अन्य लोग इसे केवल आदिकाल वा प्रारंभिक युग कहकर ही सन्तोष ग्रहण कर लेते हैं। विषय की दृष्टि से इस युग में उक्त तीनों रसों की रचनाएँ प्रायः समान रूप से दोख पड़ती हैं । बोद्ध सिद्धों, जन मुनियों तथा इसके उत्तराद्ध काल के भक्त कवियों की कृतियों में शांत- रस की प्रधानता है । प्रेम-कहानियों में श्उंगाररस प्रमुख बन गया है और जैन प्रबन्ध- काव्यों वा रसों जैसी रचनाओं में प्रसंगानुसार वीर एवं श्वंगार दोनों ही प्राय: एक




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