हिंदी व्याकरण | Hindi Vyakaran

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ९० ) बाबू जगन्नाथदास ( रलाकर ), बी० ए० । बाबू श्यामसुंदरदाख, बी० ए० ! पंड़िव रामचंद्र शुक्क । इन सब सज्नों के प्रति इम श्रपनी दार्दिक कृतश्षता प्रकट करते हैं। पं० महावीरप्रसाद द्विवेदी के हम विशेषतया कृतज्ञ हैं, क्योंकि झापने हस्त-लिखित प्रति का झधिकांश भाग पढ़कर झनेक उपयोगी सूचनाएं देने की कृपा श्रौर परिश्रम किया है। खेद है कि पं० गोविंद- नारायणजी मिश्न तथा पं० अंबिकाप्रसादजी वाजपेयी समया भाव के कारण समिति की बैठक में योग न दे सके जिससे हमें श्राप लोगों की दिद्वत्ता झार सम्मति का लाभ प्राप्त न हुआ । व्याकरणा-संशो- धन-ससिति की सम्मति शम्यत्र दी गई है । झंत में, हम विज्ञ पाठकों से नर निवेदन करते हैं कि श्राप लोग कपा कर हमें इस पुस्तक के दोपों की सूचना अवश्य देवें । यदि इंश्वरच्छा से पुस्तक को द्िवीयाबृत्ति का साभाग्य प्राप्त ्वगा ता उसमें इन दोषों का दूर करने का पूणण प्रयत्न किया जायगा ।. तब तक पाठक-राण क्पा कर “हिंदी-व्याकरण”” क॑ सार का उसी प्रकार प्रह्दश करें जिस प्रकार-- संत-हंस गुण गदद्दिं पय, परिहरि वारि-विकार ! गढ़ा-फाटक, जबलपुर; | निवेदक-- बसंत-पंचमी, | कामताघवाद गुरु सें० १६७७ ।




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