जैनेन्द्र सिद्धान्त कोसा (भाग २) | Jainendra Siddhanta Kosa (Part 2)

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Book Image : जैनेन्द्र सिद्धान्त कोसा (भाग २) - Jainendra Siddhanta Kosa (Part 2)

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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करण एण्ड है। बहुरि अन्त समय सम्बन्धी अन्तका अनुकृष्ट खण्ड ( ५७) सो तर्वोत्कृष्ट है। सो इन दोऊनिक कहीं अन्य ख़ाण्डकरि समानता नाहीं है । बहुरि अवशेष ऊपरि समय सम्बन्धी खण्डनिक नीचले समम सम्बन्धी লি सहित अयवा नीचले समय सम्बन्धी ख़ण्ड- निक ऊपरि समय सम्बन्धी सष्डनि सहित यथा सम्भव समानता है। तह द्वितीय समयते तगाय द्विषम्‌ समय पूयत चे समय (रसे १६ उक ऊ समय } तिनिका पितता पहिला एण्ड (४०६३ ), अर धत (नं ०१६) समयके प्रथम एण्डतै गाय वचरम सण्ड पयत (१४-३६ ) धपने अपने उपरिके समय सम्बन्धी खण्डनिकरि समान नाहं है, तातै असद है । सो द्वितीयादि चरम समय ष्यत सम्बन्धौ छण्डनिकी उर्ध्वं स्वना कए ऽपरि अन्त समयते प्रथमार्दि द्िविरम प॑त लण्डनिफौ तिर्यक्‌ रचना कीएं अंकुशके आकारकी रचना हौ है । तात यद्र अकु रचना कहिये । बहुरि द्वितीय समयत लगाई द्रिचरम समय परयत सम्बन्धी अंत अंतके ख़ण्ड अर प्रथमं समय सम्बन्धी प्रथम्‌ खण्ड (३६] बिना अन्य सर्व खण्ड ते अपने अपने नीचले समय सम्बन्धी किसी ही खण्डनिकरि समान नाही तात असश है। सो इहा द्वितीयादि द्विचरम पर्मन्त समय सम्बन्धौ अंत अत्‌ एण्डनिकौ ऊर्घ्वं रचना कीए अर नीचै प्रथम समयक द्वितीयादि अत पर्यत खण्डनिकी तिर्यक रचना कीए, हलके आकार रचना हो है) तातं यु लागे चित्र कहिये | बहुरि जधत्य उकृष्ट खण्ड अर्‌ उपरि नीचै समथ सम्बन्धी खण्डनिकौ अपश्च कटे असदृश खण्ड तिनि ख़ण्डनि बिना अवशेष सर्वख़ण्ड अपने ऊर्पारक और भीचते समग्रसम्बन्धी सण्डनिकरि यथा सम्भव समान है। (प०१३०- १३९) । (अक्र रचनाके सर्व परिणाम यद्यपि अपनेसे नीचेवाले समम किन्हों परिणाम खण्डोंसे अर्थ मिलते है, परन्तु अपनेसे ऊपराले उपमोके किसी भी परिणाम ख़ण्डके साथ नहीं मिलते । इसी प्रकार लागत रचनाक़े सर्व परिणाम यद्यपि अपनेसे ऊपखाते समयोके किन्हीं परिणाम सण्डॉंसे अवश्य मिलते है, परन्तु अपनेसे नोचेवाते समयोके किसी भी परिणाम रूण्डके साथ नहीं मिलते। इनके अतिरिक्त दीचके सर्व परिणाम ऊण्ड अपने ऊपर अथवा नीचे दोनों ही समके प्रिगाम ख़ण्डोंके साथ वरावर मिलते हो है। (६६१६-८,४२१४/१ ) | ५, परिणामोंकी विशुदतके अविसाग प्रतिच्छेद, अंक संचृष्टि व यंत्र गो, जो |जो, ४ 1९६१०४१ तत्ाघ प्रदृत्तकरणपरिणामेपु प्रथमसमयपरि- পের मध्ये प्रथमखण्डपरिणामा असख्यातलोकमात्रा, «अपब- दा मेल्‍्याउप्रतरावलिभत्तास रुपातत्तोकमादा भवन्ति ~ है ५ चू जरन्यन ध्यमोछशमेउ भिनत्ताना এ दितीयसमयप्रयमखण्डपरिणा- ह मान्वयाधिर जवन्वमध्यमोकृरिकःपा प्राग्वदर्सरुपातलो कद रें- ४, अधअवृत्तकरण निर्देश स्थानवृद्धिव शिता: प्रथमज़ण्डपरिणामा' सन्ति । एवं तृतीयसमयादि- चरमसमयपर्यन्त चयाधिका' प्रथमज़ण्डपरिणामाः सच्धि तंथा प्रथमा- दिस्भयेषु॒द्वितीयारिलण्डपरिणामा अपि चयाधिकाः सन्ति। >अब विशुद्धताके अविभाग प्रतिच्छेदनिकी अपेक्षा वर्णन करिए है। हिनिकी अपेक्षा गणना करे पूर्वोक्त अधकरणनिके खग्डनि विष अह्पनहुल्ल वर्णन करे है--तहाँ अध. प्रदत्ररणके प्रिणामनिविषे प्रथम समय सम्बन्धी परिणाम, तिनिके सण्डनिविषै जे प्रथम ख़ण्डके परिणाम ते सामान्यपने असंस्माततोकमात्न (३६) है । तथापि पुर्वोक्त विधानके अनुसार- संख्यात पतराबतीकौ जाक भाग दीजिए रेखा असंल्यातसोक मात्र है ( अर्थाद्‌ असप. परतरा” बली-लोकके प्रदेश )। ते ए परिणाम अविभाग प्रतिच्छेदनिकी अपेक्ा जधन्य मध्यम उत्तृष्ट भेद लिये है। -अमते प्रथम परिणामतै लगाड इतने परिणाम (देखो एक पट स्थान पत़ित हानिनचृद्धिका स्प) भए पठे एक बार पदस्थान बृद्धि परणं होत (अर्थात पं होती है)। ( ऐसी ऐसी ) उसस्ात लोकंमात्र नार षट्‌ स्थान पर्नित वृद्धि भए तिस प्रथम ख़ण्डके सच परिणामनिकी सख्या (१९) पूणं होई है। {जैसे संदष्ट सर्व जधेन्य विदु -८, एक षटूस्थाने पतितं वृद्धि ई; असख्यातत लोक = १०। तो प्रथम खण्डक कुलं परिणाम ८०८६९१० =४८०। इनमें परत्यक परिणामं षटस्थाने पतितत নুর ताये अनुसार उत्तरोत्तर एक-एक वृद्धिगत स्थान रूप है) धाते अरख्यात তনিমা ঘহুতখাল ঘবির बृद्धि करि बद्ध मान प्रथम ख़ण्डके परिणाम है । पृ” १३२1 पैसे ही द्वितीय समयके प्रथम खण्डका परिणाम (४०) अनुकृष्ट चयकरि अधिक है। ते जघन्य मध्यम उत्कृष्ट भेद लिये हैं। सो मे भी पूर्वोक्त प्रकार असंख्यात लोकमांत्र पटस्थान पहित वृद्धिकरि वर्दमान है ! * (एक अनुकृष्ट चय जितनी षट्‌ स्थानपतित वृधं सम्भवे है) तितनी बार अधिक पदूस्थानपतित वृद्धि प्रथम समग्रके प्यम्‌ सण्डते दवितीय समयक प्रथम सण्डे सम्मद है। ( अर्थात्‌ यदि प्रथम विकर्प में ६ बार वृद्धि अहण की थी तो यहाँ बार ग्रहण करना )। ऐसे हो तृतीय आदि अन्तपर्यन्त समयनिक प्रथम ख़ण्डके परिणाम एक अनुकृष्टि चयकरि अधिक है। बहुरि तै हौ प्रथमादि समयनिक अपने अपने प्रथम ख़ण्डतै द्वितीय आदि खण्डमिके परिणाम भौ करमते एक एकं चय अधिक है। तहाँ यथा प्रम्भव षृट्‌ स्थान पतित वृद्धि जेती बार होइ तितना प्रमाण (प्रत्येक ण्डके प्रति) जानना 1 ( पृ० ९६३३) 1 स्वकृत संहि व यन््--उपरोक्त कथमक तात्पर्थपरसे निम्म प्रकार তি की जा सकती है 1--सर्व जघन्य परिणामकी নি ८ अविभाग प्रतिच्छेद; तथा प्रत्येक अनन्तेगुणृद्धि =१ की वृद्धि। यन्तम क তত অন্য उक्ष पर्यन्त स्व परिणाम दाति सिर जधम्य व उवते दौ ही क दकथि जायेंगे। तहाँ बीचके परिणामोंकी विश्ुवधता ऋ्मसे एक-एक वृद्धि सहित योग्य प्रमाणें जान लेना । जैनेन्र सिद्धान्त कोश




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